आलोचना, आलोचना और सिर्फ आलोचना ! चौबीसो घंटे चारो तरफ आज इस देश में सिर्फ और सिर्फ आलोचना ही गूंजती है ।चाहे वह 80 साल का बूढ़ा हो या 17-25 साल का जवान जिसकेअंदर गर्मजोशी होती है, सब के मुखमंडल पर आलोचना घर बना चुकी है । ऐसा लगता है मानो इस क्रांतीकारियो के देश में आज देशवासियो के अंदर का क्रातिकारी मर चुका है। खुद कुछ कर गुजरने की इच्छा दम घोट चुकी है। यह देख कर ऐसा लगता है मानो हताशा हमारे जहन में पैठ कर चुकी है ।इतनी आलोचनाए सुन कर अब लगने लगा है जैसे लोग बिना लड़े ही हार चुके है बिना लड़े ही अपने हाथ खड़े कर चुके है । कह सकते है आशावादी कहे जाने वाले भारतीय आशा की किरण की आशा छोड़कर निराशावादी बन चुके है। आज में इतना आशवस्त होके इतने भरोसे और शर्म से ऐसा चौबीसो घंटे और चारो तरफ होती नाना प्रकार की आलोचनायें सुन कर कह सकता हूँ। क्योंकी आलोचनाये वो करते है जो कुछ नही कर सकते है । आलोचनाये सिर्फ और सिर्फ हताश और निराश लोग ही करते है क्योंकी वह समझते है वह यह बहुत अच्छे से जानते है कि वह उस को सही नही कर सकते , कर इसलिए नही सकते क्योंकी वह उसे सही नही करना चाहते है। उनके अंदर कुछ कर गुजरने का जज्बा मर चुका है।
आज हर तरफ चौराहो पर चौपालो पर , खोमचो पर तकनीकी क्रांती की मिशाल कहे जाने वाले कंप्यूटर्स में सदा दौड़ती भागती सोशल नेटवर्किंग साईटस पर हर जगह निराशावादी भारत का मानचित्र तैयार होता दिखता है । आज हर तरफ सुनने को मिलती है नेता , इस तबाह होते प्रजातंत्र की आलोचना सिर्फ और सिर्फ आलोचना । क्या इस देश को महंगाई , भ्रष्टाचार , भुखमरी , गरीबी , से आलोचना करने पर राहत मिल जायेगी। क्या सरकार की बेकार की नीतियों की अवहेलना करने से यह नीतियाँ बदल जायेंगी । या नेताओं को गलियाने से नेता बदल जायेंगे उनका हृद्य परिवर्तन हो जायेगा । इन सब सवालो का जवाब सिर्फ "नही" है।
जी इन सब सवालो को जवाब नही है । आलोचना इन सवालो का जवाब नही है। आलोचना से कभी चीजे नही सुधर सकती हमें यह समझना होगा । पर इसका मतलब यह नही की हम चुप चाप हाथ पर हाथ रख कर बैठ जाये और इस तमाशे को होता देख ताली पीटे। हम जिस भारत देश में रहते है वह क्रांतिकारियों की भूमी कही जाती है । हम आजाद , भगत सिंह , महात्मा गांधी की धरती के लोग है। जिन्होने अपने जज्बे , कुछ कर गुजरने की इच्छा के बल पर इस भारत देश को अंग्रेजो से आजाद कराया था। हम सब में भी एक गांधी एक आजाद बसते है बस जरूरत है और वक्त है अपने अंदर के मरे हुए उस क्रांतिकारी को जगाने की और एक दृढ़ निश्चय करने की कि हम अपने बल पर इस तबाह होते देश को बचायेंगे , हम अपने बल पर भ्रष्टाचार , गरीबी मिटायेंगे और कानून व्यवस्था सुधारेंगे। बस एक दृढ संक्लप की जरूरत है और जिस दिन हम यह कर लेंगे उस दिन इस देश में चौबीसो घंटे चारो चरफ क्रांती और देश को आगे बढाने की नीतिया और सुझाव गूजेंगे । उस दिन इस देश की हवा में सकारात्मकता की खुशबू होगी जो आलोचना जैसी नकारात्मकता को अपनी इस खुशबू में ढक लेगी । उस दिन इस देश में सब देशभक्त बन जायेंगे क्योकीं सच्चा और असली देशभक्त वह होता है जो देश के लिए काम करता है वह नही जो सिर्फ देश के लिए सोचता है ।
वन्दे मातरम ।।
आज हर तरफ चौराहो पर चौपालो पर , खोमचो पर तकनीकी क्रांती की मिशाल कहे जाने वाले कंप्यूटर्स में सदा दौड़ती भागती सोशल नेटवर्किंग साईटस पर हर जगह निराशावादी भारत का मानचित्र तैयार होता दिखता है । आज हर तरफ सुनने को मिलती है नेता , इस तबाह होते प्रजातंत्र की आलोचना सिर्फ और सिर्फ आलोचना । क्या इस देश को महंगाई , भ्रष्टाचार , भुखमरी , गरीबी , से आलोचना करने पर राहत मिल जायेगी। क्या सरकार की बेकार की नीतियों की अवहेलना करने से यह नीतियाँ बदल जायेंगी । या नेताओं को गलियाने से नेता बदल जायेंगे उनका हृद्य परिवर्तन हो जायेगा । इन सब सवालो का जवाब सिर्फ "नही" है।
जी इन सब सवालो को जवाब नही है । आलोचना इन सवालो का जवाब नही है। आलोचना से कभी चीजे नही सुधर सकती हमें यह समझना होगा । पर इसका मतलब यह नही की हम चुप चाप हाथ पर हाथ रख कर बैठ जाये और इस तमाशे को होता देख ताली पीटे। हम जिस भारत देश में रहते है वह क्रांतिकारियों की भूमी कही जाती है । हम आजाद , भगत सिंह , महात्मा गांधी की धरती के लोग है। जिन्होने अपने जज्बे , कुछ कर गुजरने की इच्छा के बल पर इस भारत देश को अंग्रेजो से आजाद कराया था। हम सब में भी एक गांधी एक आजाद बसते है बस जरूरत है और वक्त है अपने अंदर के मरे हुए उस क्रांतिकारी को जगाने की और एक दृढ़ निश्चय करने की कि हम अपने बल पर इस तबाह होते देश को बचायेंगे , हम अपने बल पर भ्रष्टाचार , गरीबी मिटायेंगे और कानून व्यवस्था सुधारेंगे। बस एक दृढ संक्लप की जरूरत है और जिस दिन हम यह कर लेंगे उस दिन इस देश में चौबीसो घंटे चारो चरफ क्रांती और देश को आगे बढाने की नीतिया और सुझाव गूजेंगे । उस दिन इस देश की हवा में सकारात्मकता की खुशबू होगी जो आलोचना जैसी नकारात्मकता को अपनी इस खुशबू में ढक लेगी । उस दिन इस देश में सब देशभक्त बन जायेंगे क्योकीं सच्चा और असली देशभक्त वह होता है जो देश के लिए काम करता है वह नही जो सिर्फ देश के लिए सोचता है ।
वन्दे मातरम ।।