Monday, 19 August 2013

बदनाम फिर भी आम : आखिर क्यों?
आज 12 या 5 रूपये में भर पेट भोजन मिले न मिले , चवन्नी अठ्ठन्नी मिले न मिले , शायद भगवान भी न मिले , या अजूबे के तौर पर शायद कोई हिंदू, मुस्लमान, सिख, ईसाई न मिले , लेकिन एक चीज जो बदनाम होकर भी आम हो गई है वह आपको राजधानी से भी तेज चलती समाचार बुलेटिनस् और एंकरो की तेज तरार जुबान पर आसानी से मिल जायेगी । और यह है बदनाम कम आम चीज बलात्कार । एक ऐसी चीज जो सब को कुछ देती है जैसे किसी को सत्ता का मुद्दा, तो किसी को तिरस्कार लाचरी घृणा मर मर के जीने की सजा , तो भर भी देती है किसी का पेट एक मुद्दा बनकर तो किसी कि हवस बुझाकर । यही है बलात्कार की परिभाषा जो हमारा दोगला रवैया बाहर थूकता नजर आता है । यही है वह परिभाषा जो 16 दिस्मबर 2012 को हुये घटनाक्रम पर हमारे तत्काल रवैये और फिर हमारे शांत रवैये से निखर कर आती है ।
16 दिसंबर  2012 की रात एक ऐसी घटना हुयी जिसने 17 की सुबह होने तक दिल्ली समेत पूरे देशवाशियो कि जड़े हिला कर रख दी । सुबह होने से पहले इस घिनोने अपराध कि घिनोनी कहानी लोगो की जुबान पर चढ़ चुकी थी। हर कोई हस्तप्रभ था , 16 दिसंबर के बाद जिस तरह से जनता ने अपना नया रूप दिखाया उसे देखकर ऐसा लगा मानो सरकार कोई कानून बनाये न बनाये आज यह लोग पूरा संविधान जरूर बदल देंगे। वह रौद्र रूप शायद  ही कभी कोई भूलेगा । लेकिन सवाल यह है कि जनता के उस रौद्र रूप के बाद , सरकार के चितन और कानून में एक बचकाने से संशोधन के बाद भी यह घटनाक्रम रुकने का नाम क्यों नही ले रहा है । आखिर क्यों हर दिन एक नयी दामिनी और एक नयी गुड़िया  बन रही है । क्यों हर दिन चैनलो पर बढ़ती बलात्कार बुलेटिनस् तेज होती जा रही है आखिर क्यों । शायद इसका जवाब है हमारा लचीला पुराना जर्जर हो चुका सविंधान और कानून । सविधान से ही कानून बनता है और कानून एक डंडे की तरह है जिसका डर और दर्द पड़ने  पर ही मालूम होता है। और शायद इसी के कारण 16 दिसंबर 2012 के बाद भी मात्र दिल्ली में ही  806 बलात्कार हो चुके है ।
और डंडा जितना मोटा होता है उतना ही ज्यादा इसका डर और दर्द होता है । लेकिन बलात्कार के कानून का डंडा तो इतना पतला है कि खरिका भी उसके सामने तंदरूस्त लगता है। और कानून देता है इस जघ्नय अपराध पर 10 साल की सजा । 10 साल की सजा एक ऐसे अपराध के लिए जो हत्या से भी ज्यादा धिनोना है । इस अपराध के लिए 10 साल की सजा काफी छोटी है क्योंकी इससे ज्यादा साल तक तो केस ही चलता रहेगा । तो सवाल यह है कि आखिर कैसे इस बढ़ते हुए अपराध को रोका जाये ?
अगर किसी तरह इस बढ़ते हुए अपराध को किसी तरह रोका जा सकता है तो वह है संविधान के साथ रहते हुए संविधान में संशोधन। बलात्कार करने पर आज 10 साल की सजा है इस सजा को बढ़ा कर फांसी की कर दी जाये । और इस सजा को खाली पेपरो पर न रखकर इसका इम्पलामंटेशन हो । और साथ ही एक फास्टट्रेक कोर्ट बनायी जाये जो 30 दिन के भीतर सजा सुनाये और यह सुनिस्चित करे कि सजा सुनाये जाने के 15 दिन के भीतर अपराधी को फांसी मिल जाये । ऐसा करने से लोगो के दिमाग में एक डर बैठेगा जिस्से वह ऐसा कदम उठाने से डरेंगे। और फलस्वरूप दामिनियों और गुड़ियो की गिन्ती भी कम होगी । क्योंकी डंडा पड़ने पर ही उसका डर और दर्द पता चलता है ।

Sunday, 21 April 2013

दिल्ली अब धड़कती नही दहलती है ।।..


दिल्ली अब धड़कती नही दहलती है। यह कथन आज की दिल्ली की स्थिती देखते हुए गलत नही हो सकता । हर घंणटे, हर रोज दहलती है दिल्ली . हर मिनट हर सेंक्ड सिसकती है दिल्ली । हर दिन हर रात चौबीसो घंणटे अपनी बेटियो की और अपनी  बोटी बोटी नुचते देख रोती है दिल्ली। अपनी छाती से जिन बेटो को लगाकर रखती थी दिल्ली आज उन्ही बेहरूपी दरिंदो से उसी छाती को बचाती मुँह छुपा रही है दिल्ली। क्या यही है वो दिल्ली जहीँ देश भर के नौजवान कुछ  मुठ्ठी भर सपने लाकर अपने आप को गौरवानवित महसूस करते थे। क्या यह वही दिल्ली है जहाँ लड़किया आकर अपने पंखो को उड़ान देती थी। क्या यही है वो दिल्ली? . क्या यही है वो सपनो का शहर? यही कुछ सवाल है जो आज हर एक दिल्लीवासी अपने आप से पूछ रहा, यही वो सवाल है जो दिल्ली की बेटिया दिल्ली से पूछ रही । यही वो सवाल है जिसका जवाब दिल्ली अपनी बची कुची अस्मिता को बचाने के लिए ढूँढ़ रही है ।
बहरहाल दिल्ली में लगातार बलात्कार की होती घटनांओ के कारण यह सवाल उठने लाजिमी है। दामिनी गैंगरेप जिसने पूरी दिल्ली ही वल्की पूरे देश को हिला कर दिया । इस घटना ने हमारे मार्डन इंडिया में रहने वाली देवी के समान पूजी जाने वाली भारताय नारी की स्थिति की कलई खोल दी । इस घटना ने देश को यह भई बता दिया कि अभी भी हमारे अंदर क्रांतीकारी बसते है हम अन्याय नही सहेंगे। और साथ ही इस घटना ने हमारी सरकार की भी नीचता का बहुत ही खूबसूरत उदाहरण दिया है । जिसने इस जग्नय अपराध के खिलाफ कोई कड़ा रुख न अपनाकर उसे एक सियासी मुद्दा बनाया। बलात्कारी का अपना जुर्म कबूल करने के बाद भी उसे सजा मुर्कर नही किया जाना और इस अपराध की तफतीस मे लग जाना यह सारी की सारी बाते कही न कही हमारे पुराने और धीमे सिस्टम के बदलाव पर प्रकाश भई ड़लती है । बहरहाल इस बलातेकार कांड़ के बाद दिल्ली और केंद्र सरकार के ढ़ीले रवैये और पुलिस की लाचारी ने मानो लोगो के अंदर की वासना को जागृत करके एक मंच प्रदान कर दिया है, अपनी अंदर दबी कुंठाओ और कु- इच्छाओं को समाने रखने का जिससे लोग अपने अंदर उठती इन लहरो को दबाने की जगह इन्हे बाहर लाकर दूसरो की जिंदगी तबाह करने से नही चूक रहे है। दिल्ली और पूरे देश में बढ़ते हुए " कारो और बसो में लगातार बढ़ते हुए गैंगरेप " इसका जीता जागता उदाहरण है । लेकिन इस सरकार को लाने वाले भी तो हम ही है । इस देश की गलीयारे में देहव्यापार को बढ़ावा देने वाले भी तो हम है । रास्ते में जाती लड़कियो को इस समाज के कुछ बहस्कृत नामो का तमगा पहनाने वाले भी तो हम ही । और दामिनी या 5 साल की गुड़िया के बलात्कार के बाद न्याय के लिए चिल्लाने वाले भी तो हम ही है । तो आखिर गुनहगार कौन सरकार जिसे हमने चुना अपने होशो हवाश मे या फिर वो बाबा आजम के जमाने की न्यायपालिका, या हमारा सिस्टम, या फिर उस बलात्कारी को जन्म देने वाली अभागी माँ । आखिर कौन? चिंतन करने पर एक ही जवाब मिलेगा कि हम, हम भी उतने ही बड़े गुनहगार है जितने बड़े वो बलात्कारी । आखिर में नेनसी मे इतना ही कहूँगा कि यह देश उतना तबाह दुष्टो की दुष्टता से नही , जितना सज्जने की निष्क्रियता से है ।।
                                                                              
                                                                                

आलोचना किसी का हल नही


दिल्ली अब धड़कती नही दहलती है ।



दिल्ली अब धड़कती नही दहलती है। यह कथन आज की दिल्ली की स्थिती देखते हुए गलत नही हो सकता । हर घंणटे, हर रोज दहलती है दिल्ली . हर मिनट हर सेंक्ड सिसकती है दिल्ली । हर दिन हर रात चौबीसो घंणटे अपनी बेटियो की और अपनी  बोटी बोटी नुचते देख रोती है दिल्ली। अपनी छाती से जिन बेटो को लगाकर रखती थी दिल्ली आज उन्ही बेहरूपी दरिंदो से उसी छाती को बचाती मुँह छुपा रही है दिल्ली। क्या यही है वो दिल्ली जहीँ देश भर के नौजवान कुछ  मुठ्ठी भर सपने लाकर अपने आप को गौरवानवित महसूस करते थे। क्या यह वही दिल्ली है जहाँ लड़किया आकर अपने पंखो को उड़ान देती थी। क्या यही है वो दिल्ली? . क्या यही है वो सपनो का शहर? यही कुछ सवाल है जो आज हर एक दिल्लीवासी अपने आप से पूछ रहा, यही वो सवाल है जो दिल्ली की बेटिया दिल्ली से पूछ रही । यही वो सवाल है जिसका जवाब दिल्ली अपनी बची कुची अस्मिता को बचाने के लिए ढूँढ़ रही है ।
बहरहाल दिल्ली में लगातार बलात्कार की होती घटनांओ के कारण यह सवाल उठने लाजिमी है। दामिनी गैंगरेप जिसने पूरी दिल्ली ही वल्की पूरे देश को हिला कर दिया । इस घटना ने हमारे मार्डन इंडिया में रहने वाली देवी के समान पूजी जाने वाली भारताय नारी की स्थिति की कलई खोल दी । इस घटना ने देश को यह भई बता दिया कि अभी भी हमारे अंदर क्रांतीकारी बसते है हम अन्याय नही सहेंगे। और साथ ही इस घटना ने हमारी सरकार की भी नीचता का बहुत ही खूबसूरत उदाहरण दिया है । जिसने इस जग्नय अपराध के खिलाफ कोई कड़ा रुख न अपनाकर उसे एक सियासी मुद्दा बनाया। बलात्कारी का अपना जुर्म कबूल करने के बाद भी उसे सजा मुर्कर नही किया जाना और इस अपराध की तफतीस मे लग जाना यह सारी की सारी बाते कही न कही हमारे पुराने और धीमे सिस्टम के बदलाव पर प्रकाश भई ड़लती है । बहरहाल इस बलातेकार कांड़ के बाद दिल्ली और केंद्र सरकार के ढ़ीले रवैये और पुलिस की लाचारी ने मानो लोगो के अंदर की वासना को जागृत करके एक मंच प्रदान कर दिया है, अपनी अंदर दबी कुंठाओ और कु- इच्छाओं को समाने रखने का जिससे लोग अपने अंदर उठती इन लहरो को दबाने की जगह इन्हे बाहर लाकर दूसरो की जिंदगी तबाह करने से नही चूक रहे है। दिल्ली और पूरे देश में बढ़ते हुए " कारो और बसो में लगातार बढ़ते हुए गैंगरेप " इसका जीता जागता उदाहरण है लेकिन इस सरकार को लाने वाले भी तो हम ही है । इस देश की गलीयारे में देहव्यापार को बढ़ावा देने वाले भी तो हम है । रास्ते में जाती लड़कियो को इस समाज के कुछ बहस्कृत नामो का तमगा पहनाने वाले भी तो हम ही । और दामिनी या 5 साल की गुड़िया के बलात्कार के बाद न्याय के लिए चिल्लाने वाले भी तो हम ही है । तो आखिर गुनहगार कौन सरकार जिसे हमने चुना अपने होशो हवाश मे या फिर वो बाबा आजम के जमाने की न्यायपालिका, या हमारा सिस्टम, या फिर उस बलात्कारी को जन्म देने वाली अभागी माँ । आखिर कौन? चिंतन करने पर एक ही जवाब मिलेगा कि हम, हम भी उतने ही बड़े गुनहगार है जितने बड़े वो बलात्कारी । आखिर में बेबसी मे इतना ही कहूँगा कि यह देश उतना तबाह दुष्टो की दुष्टता से नही , जितना सज्जने की निष्क्रियता से है ।

Thursday, 14 March 2013

आलोचना किसी का हल नही।।

आलोचना, आलोचना और सिर्फ आलोचना ! चौबीसो घंटे चारो तरफ आज इस देश में सिर्फ और सिर्फ आलोचना ही गूंजती है ।चाहे वह 80 साल का बूढ़ा हो या 17-25 साल का जवान जिसकेअंदर गर्मजोशी होती है, सब के मुखमंडल पर आलोचना घर बना चुकी है । ऐसा लगता है मानो इस क्रांतीकारियो के देश में आज देशवासियो के अंदर का क्रातिकारी मर चुका है। खुद कुछ कर गुजरने की इच्छा दम घोट चुकी है। यह देख कर ऐसा लगता है मानो हताशा हमारे जहन में पैठ कर चुकी है ।इतनी आलोचनाए सुन कर अब लगने लगा है जैसे लोग बिना लड़े ही हार चुके है बिना लड़े ही अपने हाथ खड़े कर चुके है । कह सकते है आशावादी कहे जाने वाले भारतीय आशा की किरण की आशा छोड़कर निराशावादी बन चुके है। आज में इतना आशवस्त होके इतने भरोसे और शर्म से ऐसा चौबीसो घंटे और चारो तरफ होती नाना प्रकार की आलोचनायें सुन कर कह सकता हूँ। क्योंकी आलोचनाये वो करते है जो कुछ नही कर सकते है । आलोचनाये सिर्फ और सिर्फ हताश और निराश लोग ही करते है क्योंकी वह समझते है वह यह बहुत अच्छे से जानते है कि वह उस को सही नही कर सकते , कर इसलिए नही सकते क्योंकी वह उसे सही नही करना चाहते है। उनके अंदर कुछ कर गुजरने का जज्बा मर चुका है।
           आज हर तरफ चौराहो पर चौपालो पर , खोमचो पर तकनीकी क्रांती की मिशाल कहे जाने वाले कंप्यूटर्स में सदा दौड़ती भागती सोशल नेटवर्किंग साईटस पर हर जगह निराशावादी भारत का मानचित्र तैयार होता दिखता है । आज हर तरफ सुनने को मिलती है नेता , इस तबाह होते प्रजातंत्र की आलोचना सिर्फ और सिर्फ आलोचना । क्या इस देश को महंगाई , भ्रष्टाचार , भुखमरी , गरीबी , से आलोचना करने पर राहत मिल जायेगी। क्या सरकार की बेकार की नीतियों की अवहेलना करने से यह नीतियाँ बदल जायेंगी । या नेताओं को गलियाने से नेता बदल जायेंगे उनका हृद्य परिवर्तन हो जायेगा । इन सब सवालो का जवाब सिर्फ "नही" है।
जी इन सब सवालो को जवाब नही है । आलोचना इन सवालो का जवाब नही है। आलोचना से कभी चीजे नही सुधर सकती हमें यह समझना होगा । पर इसका मतलब यह नही की हम चुप चाप हाथ पर हाथ रख कर बैठ जाये और इस तमाशे को होता देख ताली पीटे। हम जिस भारत  देश में रहते है वह क्रांतिकारियों की भूमी कही जाती है । हम आजाद , भगत सिंह , महात्मा गांधी की धरती के लोग है। जिन्होने अपने जज्बे , कुछ कर गुजरने की इच्छा के बल पर इस भारत देश को अंग्रेजो से आजाद कराया था। हम सब में भी एक गांधी एक आजाद बसते है बस जरूरत है और वक्त है अपने अंदर के मरे हुए उस क्रांतिकारी को जगाने की और एक दृढ़   निश्चय करने की कि हम अपने बल पर इस तबाह होते देश को बचायेंगे , हम अपने बल पर भ्रष्टाचार , गरीबी मिटायेंगे और कानून व्यवस्था सुधारेंगे। बस एक दृढ संक्लप की जरूरत है और जिस दिन हम यह कर लेंगे उस दिन इस देश में चौबीसो घंटे चारो चरफ क्रांती और देश को आगे बढाने की नीतिया और सुझाव गूजेंगे । उस दिन इस देश की हवा में सकारात्मकता की खुशबू होगी जो आलोचना जैसी नकारात्मकता को अपनी इस खुशबू में ढक लेगी । उस दिन इस देश में सब देशभक्त बन जायेंगे क्योकीं सच्चा और असली देशभक्त वह होता है जो देश के लिए काम करता है वह नही जो सिर्फ देश के लिए सोचता है ।
वन्दे मातरम ।।